‘गोदान’ का नायक होरी है।
ज़मींदार और महाजन में भेद करते हुए वह बताता है—“ज़मींदार तो एक ही है; मगर महाजन तीन-तीन हैं, सहुआइन अलग, मँगरू अलग और दातादीन पंडित अलग।” पाँच साल हुए होरी ने मँगरू साह से साठ रुपए उधार लिए थे बैल लाने के लिए। उसमें से वह साठ दे चुका था; परन्तु वह साठ रुपए अब भी बने हुए थे। दातादीन पंडित से उसने तीस रुपए लिए थे आलू बोने के लिए। दुर्भाग्य से आलू चोर खोद ले गए परन्तु उन तीस रुपयों के तीन सौ हो गए। दुलारी विधवा सहुआइन नोन-तेल-तमाखू की दुकान करती थी; इकन्नी रुपया का ब्याज लेती थीं। इनके भी सौ रुपए हो गए थे। फ़सल होते ही माल सब महाजनों को तौल देना पड़ता और ब्याज फिर बढ़ने लगता। तमाशा यह कि एक समय होरी ने भी महाजनी की थी जिससे लोग समझते थे कि उसके पास अब भी दबा हुआ रुपया है।…


CLASS NOTES ARITHMETIC (E) (2022-23) 





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