सिनेमा और थिएटर के अन्तरिक्ष में विधाओं के आर-पार उड़नेवाले धूमकेतु कलाकार पीयूष मिश्रा यहाँ, इस जिल्द के भीतर सिर्फ़ एक बेचैन शब्दकार के रूप में मौजूद हैं। ये कविताएँ उनके जज़्बे की पैदावार हैं जिन्हें उन्होंने अपनी कामयाबियों से भी कमाया है, नाकामियों से भी। हर अच्छी कविता की तरह ये कविताएँ भी अपनी बात ख़ुद कहने की क़ायल हैं, फिर भी जो ख़ास तौर पर सुनने लायक़ है वह है इनकी बेचैनी जो इनके कंटेंट से लेकर फ़ार्म तक एक ही रचाव के साथ बिंधी है।
दूसरी ध्यान रखने लायक़ बात ये कि इनमें से कोई कविता अब तक न मंच पर उतरी है, न परदे पर। यानी यह सिर्फ़ और सिर्फ़ कवि-शायर पीयूष मिश्रा की किताब है।


Rakesh Yadav Arithmetic Study Material
Disha Rajasthan Pariksha Combo of 2 Books || Bhugol And Itihas Kala Sanaskriti 






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